Tuesday, April 8, 2014

प्रेत हीं प्रेत - कुमार सच्चिदानंद सिंह

दमित वासनाओं
कुचली हुई कामनाओं
जली हुई इच्छाओं
का प्रतिरुप में
धुमता हुँ सृष्टि में
निरन्तर
उन्मुक्त, स्वच्छंद।
मैं अदृश्य, अनार्स्पर्श
हवा से भी सूक्ष्म 
तड़ित का सा वेग
न भौतिक आस्तित्व
न पदचाप
और न प्रताड़ना की कामना
फिर भी
डरते हैं मुझसे लोग
आखिर क्यों ?
जब तक बजूद था मेरा
उस संसार में
अग्रज या अनुज की
भूमिका मेरी भी रही
लेकिन मरने के बाद
मुझे गैर समझ
जातिच्यूत कर दिया गया
मेरे नाम पर
दरवाजे और खिड़कियाँ 
बन्द होने लगें 
अँधेरा, सन्नाटा 
एकान्तिकता
को मेरा साम्राज्य माना गया ।
मैं भटकता रहा हूँ 
अपनी तथाकथित
भयानक आँखों से 
संसार को देखता हूँ तो
यह राज समझ में आया
कि यह जो इन्सान है,
जीवित होने का जिसे अभिमान है,
वे मुझसे दूर कहाँ -
बासनाओं
कामनाओं
कुण्ठाओं
का प्रतिरुप यह
भागता है, दौड्ता है
उड्ता भी है
डोर कटी पंतग की तरह
निरन्तर
यद्यपि अन्धाकार पर
विजय प्राप्त करली है उसने
लेकिन मन का अँधेरा
बना लिया है बेशुमार
प्रकृति से परम्परा तक
प्रेम से प्रणय तक
अपनो से गैरों तक
सभी उसके लक्ष्य हैं,
माध्यम हैं
या हथियार । 
मैं खुश हूँ कि 
धरती पर 
असंख्य है अनुचर
या मेरा सजातीय,
मुझसे भी आगे हैं
उनके कदम दो चार 
उनके कदम दो चार
शुक्रिया ऐ संसार । 



Wednesday, March 26, 2014

वीरगंज (नेपाल) में हास्य कवि सम्मेलन


१५ मार्च २०१४, रंगों का त्योहार होली के अवसर पर इसकी पूर्व संध्या में 'नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद्, वीरगंज' द्वारा स्थानीय अतिथि सदन के सभागार में 'हास्य कवि सम्मेलन' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष श्री ओमप्रकाश सिकरिया ने की जबकि प्रमुख अतिथि के रूप में साहित्यप्रेमी श्री अशोक वैद्य मंचासीन थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपमहावाणिज्य दूत श्री जसवंत सिंह एवं कन्सुल द्वय श्री पी. डी. देशपाण्डे तथा एस. एम. अख्तर एवं के. सी. टी. सी. महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं डा. हरीन्द्र प्रसाद हिमकर मंच पर उपस्थित थे। आमंत्रित कवियों में चोंच गयावी, गोपाल अश्क, इन्द्रदेव कुँवर अभियन्ता, शहजाद गुलरेज, डा. लटपट ब्रजेश, रितेश त्रिपाठी, आसनारायण प्रसाद आदि कवियों ने अपने गीत, गजल एवं व्यंग्यात्मक कविताओं से उपस्थित जन समुदाय का भरपूर मनोरंजन किया। इस आयोजन में नव हस्ताक्षर के रूप में कुमारी विजेता ने उत्कृष्ट कविता का वाचन किया। इस कवि सम्मेलन में शब्दों की बाजीगरी देखी गयी , शब्दों से ही फागुन के रंग उड़े, हास्य की फुलझडियाँ छूटीं और व्यंग्य  तीर चले । राजनीति और समाज के विभिन्न पहलुओं पर हास्य और व्यंग्य मण्डित रचनाओं के द्वारा कवियों ने श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया । सम्पूर्ण कार्यकंम का संचालन कुमार सच्चिदानन्द सिंह ने किया । 'हिमालिनी की प्रबन्ध निदेशक श्रीमती कविता दास ने भी इस कार्यक्रम में अपनी सहभागिता दी । 'नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद' का यह एक सफल आयोजन था जिसमें भाषायी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर श्रोताओं ने हिन्दी कविता का रसास्वादन किया । सभा के अन्त में डा.शिवशंकर यादव ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

Monday, April 8, 2013

गणतंत्र नेपाल में हिन्दी - कुमार सच्चिदानन्द सिंह



इतिहास की दुर्दान्त शक्तियाँ निरन्तर प्रवाहमान रहती है और इसके कारण देशों के रूप और आकार बदलते हैं, राज्यों की सीमाएँ बदलती है, राजवंशों का उत्थान और अंत होता है, शासन प्रणालियाँ बदलती हैं लेकिन धर्म संस्कृति और भाषा का रंग इतना गहरा होता है कि समय की विषम परतें इसे सहजता से धूमिल नहीं कर सकती, राज्यों की सीमाएँ इसे रोक नहीं सकती और शासन की वामदृष्टि सहजता से इसे समाप्त नहीं कर पाती नेपाल के सन्दर्भ में हिन्दी का अतीत, वर्तमान और भविष्य तथा उसकी दशा-दिशा का मूल्यांकन प्रायः इसी पृष्ठभूमि पर समीचीन है नेपाल में हिन्दी प्यार की भाषा-तकरार की भाषा, स्नेह-सम्मान-अपमान की भाषा, घृणा-द्वन्द्व-संघर्ष की भाषा, ज्ञान-धर्म-संपर्क की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है यह सच है कि नेपाल में हिन्दी किसी किसी रूप में जीवित नहीं पल्लवित और पुष्पित हो रही है और मौजूदा गणतांत्रिक नेपाल में भी यह दो परस्पर विरोधी पाटों से गुजरकर अपनी यात्रा कर रही है यद्यपि यह भी सच है कि विश्व-मानचित्र पर नेपाल ऐसे महत्वपूर्ण देश के रूप में सूचीकृत है जहाँ के लोकजीवन में हिन्दी बहुप्रयुक्त और बहुप्रचलित भाषा है संपर्क भाषा के रूप में यह केवल पूर्वी और पश्चिमी तरार्इ को जोड्ती है वरन् तरार्इ और पहाड़ को भी जोड्ती है लेकिन भाषा के नाम पर इस देश में इतनी राजनीति हुर्इ है कि इस भाषा की संभावनाओं का यहाँ सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है इसके बावजूद इतना तो माना ही जा सकता है कि इस देश में हिन्दी के प्रयोगकर्त्ता के साथ-साथ एक अच्छा पाठक-वर्ग भी है जिसका प्रमाण भारत और नेपाल से प्रकाशित हिन्दी अखबारों की विक्री और वितरण से मिलता है आज भी यहाँ अनेक सृजनशील व्यक्तित्व हैं जो अपने स्तर से इस भाषा में सक्रिय हैं और साहित्य की विभिन्न विधाओं में सर्जन कर रहे हैं


इतिहासकार मानते हैं कि आज का तिब्बत हजारों साल पहले का सुमेरू पर्वत है कहा जाता है कि प्राचीन सभ्यता सुमेरू पर्वत के नीचे ही जन्मी, पनपी और फैलती गयी उसका विस्तार ग्रीक, रोम और मेसोपोटामिया से लेकर सिंधु घाटी तक था सुमेरू पर्वत के नीचे धीरे-धीरे जिस सभ्यता ने जन्म लिया था, वह विश्व बंधुत्व का केन्द्र थी रोम और मेसोपोटामिया में यदि सिंह और सूर्य चक्र के अवशेष मिले हैं तो वह सिंधुघाटी में भी है यहाँ के रहन-सहन और धर्म लगभग समान थे वर्षों शायद एक तारतम्य था जो सुमेरू सभ्यता को बाँधे था और समूची मनुष्य जाति को जिसने खाने-पीने और विकास के तौर-तरीके समझाए थे तब इनकी भाषा भी शायद बहुत मिलती-जुलती रही होगी शिलालेख इसके प्रमाण हैं भाषा और बोली के सम्बन्ध में अकसर कहा जाता है कि हर दो कोस यानी चार मील में बोली बदल जाती है और पाँच कोस यानी दस मील में भाषा में अन्तर जाता है जो अवशेष मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि बोली या भाषा जो भी रही हो आज की देवनागरी का वह प्रारंभिक स्वरूप है
        
इस प्रसंग का उल्लेख यहाँ इसलिए आवश्यक है क्योंकि राजनीति और भूगोल की सीमाएँ कालान्तर में इतिहास पर पलीता लगाती चलती है और अपनी सुविधा के अनुसार हम नए इतिहास का निर्माण करते चलते हैं लेकिन यह बात स्वीकार किया जा सकता है कि सुमेरू सभ्यता का समूचा क्षेत्र देवनागरी लिपि का विस्तार था और उसी देवनागरी से क्रमशः हिन्दी भी विकसित हुर्इ राजेन्द्र अवस्थी ने कहा है कि ूमैं काफी वजन देकर कह सकता हूँ कि हिन्दी भाषा की भूमिका इसी क्षेत्र में लिखी गई थी बाद में वह सिमटती गई और हमलावरों और लूटेरों का कोपभाजन बनकर कई भाषाओं में बँट गई उसी के साथ देश और मनुष्य भी बदलता गया और सभ्यता की रीढ को हम क्रमशः भूलते गए हजारी प्रसाद द्विवेदी ने यह स्थापना दी है कि आज से लगभग हजार वर्ष पहले हिन्दी साहित्य बनना शुरू हुआ था इन हजार वर्षो में भारतवर्ष का हिंदीभाषी जन-समुदाय क्या सोच-समझ रहा था, इस बात की जानकारी का एक मात्र साधन हिन्दी साहित्य ही है इस आधार पर कहा जा सकता है कि कम से कम विशाल आर्यावर्त्त के आधे हिस्से की सहस्रवर्षव्यापी आशा-आकांक्षाओं का मूर्तिमान प्रतीक यह हिन्दी साहित्य अपने आप में एक ऐसी शक्तिशाली वस्तु है कि इसकी उपेक्षा पौर्वात्य साहित्य, संस्कृति और विचारधारा को समझने में घातक सिद्ध होगी परन्तु विभिन्न कारणों से सचमुच ही यह उपेक्षा होती चली आई और इसके मुख्य कारण नेपाल के सन्दर्भ में राजनैतिक रहे हैं कभी पंचायती काल में नई शिक्षा नीति की चाबुक से इसकी उपेक्षा की गई और आज गणतांत्रिक नेपाल में राजनैतिक षड्यंत्रों से इसकी उपेक्षा की जा रही है बीच के प्रजातांत्रिक काल में कुतर्क और उदासीनता के आधार पर इसकी उपेक्षा की गई मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस देश में हिन्दी की जडें काफी गहरी हैं इसलिए इसका जड-मूल मिटा देना भी सहज नहीं है यही कारण है कि हिन्दी का सवाल जिसे मृत समझ कर छोड दिया गया है, कभी-कभी अति मानवीय चरित्रों की तरह सिर चढकर बोलने लगता है
          
हिन्दी साहित्य के आदिकाल की सामग्रियों का अगर विश्लेषण किया जाए तो कहा जा सकता है कि सिद्ध साहित्य और नाथ साहित्य की परम्पराएँ नेपाल में समृद्ध रूप में मिलती हैं सिद्ध साहित्य के अर्न्तर्गत चौरासी सिद्धों की वे साहित्यिक रचनाएँ आती हैं जो तत्कालीन लोकभाषा हिन्दी में लिखी गई सरहपा, लुइपा, विरूपा, कण्हपा, कुक्कुरिपा, ताँतिपा आदि सिद्धों की कई रचनाएँ इस कोटि में आती है इनमें कुक्कुरिपा का जन्म कपिलवस्तु के एक ब्राहृमण परिवार में माना जाता है इनके जन्मकाल का पता नहीं चल सका है चर्पटीया इनके गुरु थे इनके द्वारा रचित सोलह ग्रन्थ माने जाते हैं  नाथपन्थी कवि गोरखनाथ की कर्मभूमि नेपाल के तत्कालीन गोरखा राज्य में रही है गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्त्ता माने जाते हैं हिन्दी साहित्येतिहास के विद्वान तेरहवीं शताब्दी के इस कवि की चालीस रचनाएँ होने की बात स्वीकार करते हैं जिनमें चौदह रचनाएँ प्रामाणिक मानी जाती हैं
            
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित नेपाल का हिन्दी साहित्यकार तिनकका कृति में श्री गोपाल अश्क ने यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि नेपाल में हिन्दी लेखन की परम्परा जोसमनी सन्तों से चली रही है आधुनिक नेपाल के राष्ट्र-निर्माता पृथ्वीनारायण शाह नाथ सम्प्रदाय के उन्नायक, हिन्दी के सुपरिचित कवि तथा उत्तर भारत में हिन्दू संस्कृति एवं धर्म के महान रक्षक योगी गोरखनाथ के अनन्य भक्त थे और स्वयं भी हिन्दी के उत्कृष्ट कवि थे उनके द्वारा हिन्दी में लिखे गए भजन आज भी लोकप्रिय हैं इनके अतिरिक्त रणबहादुर शाह, राजेन्द्रविक्रम शाह, उपेन्द्रविकंम, सुरमाया, शशिधर, जगत मंगल, दलजीत मंगल, अभयानन्द आदि ने भी हिन्दी में कलम चलायी सन् १७६८ में पृथ्वीनारायण शाह के राजवंश की स्थापना से पू्र्व भक्तपुर के राजा सुमति जयजीतमित मल्ल, जगज्योर्ति मल्ल्, जगत प्रकाश मल्ल, भूपतीन्द्र मल्ल, योगेन्द्र मल्ल और श्रीनिवास मल्ल द्वारा दर्जन से अधिक हिन्दी नाटक लिखे गए

मध्यकाल के सन्दर्भ में एक बात और उल्लेखित किया जा सकता है कि नेपाल की तर्राई में तीन भाषाएँ प्रमुखता से बोली जाती है - मैथिली, भोजपुरी और अवधी यह सिद्ध है कि मैथिली मिथिलांचल की भाषा है मिथिलांचल की जो पारम्परिक सीमा निर्धारित की गई है वह हिमालय की तलहटी से दक्षिण में गंगा तक और पूर्व में कोसी से लेकर पश्चिम में गण्डकी तक इस वृहत्तर मिथिलांचल का शीर्ष भाषिक क्षेत्र नेपाल में है मैथिली मिथिलांचल की सम्मानित भाषा रही है और विद्यापति मैथिली कोकिल के रूप में सम्मानित रहे हैं भोजपुरी और अवधी का भी भाषिक क्षेत्र नेपाल में है संत कबीर को भोजपुरी भाषा भाषी अपना आदि कवि मानते हैं और तुलसी तो अवधी के मुकुटमणि हैं ही अब सवाल यह उठता है कि इनका जन्मस्थान भले ही भारत की राजनैतिक सीमा के अन्तर्गत हुआ हो, लेकिन जिस भाषा के साहित्य को इन्होंने समृद्ध किया, उसका भाषिक वर्ग नेपाल में भी होने के कारण उन्हें नेपाल का कवि क्यों नहीं माना जाए - यह सच है कि सरकारी और गैरसरकारी स्तरों पर विद्यापति के नाम पर अनेक पुरस्कार और सम्मान हैं लेकिन नेपाल में विद्यापति का सम्मान नेपाली कवि के रूप में नहीं बल्कि मैथिली कवि के रूप में है लेकिन कबीर और तुलसी को नेपाल में इस स्तर का सम्मान दिलाने में क्रमशः अवधी और भोजपुरीभाषी इतने सक्षम नहीं हो पाए हैं चूँकि नेपाल में भी इन कवियों द्वारा प्रस्तुत साहित्य का भाषिक वर्ग है इसलिए इनके प्रति भी हमें गत्यातमक चिंतन रखना चाहिए

मध्ययुग में काठमाण्डू उपत्यका में नेवारी के साथ-साथ मैथिली, ब्रजभाषा, हिन्दी आदि का भी प्रयोग होता था उपत्यका से बाहर पूर्वी तथा पश्चिमी नेपाल के राजागण स्थानीय भाषाओं-मैथिली, अवधी, भोजपुरी के साथ हिन्दी -ब्रजभाषा का प्रयोग करते थे सन् १७६८ में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा वर्त्तमान नेपाल राज्य की स्थापना के बाद भी इन क्षेत्रों में प्रशासनिक कार्य क्षेत्रीय भाषा -हिन्दी में होता था इस बात की जानकारी नेपाल सरकार द्वारा प्रकाशित पुरातत्व पत्र संग्रह से प्राप्त होती है शाहवंश के पुराने राजाओं के समय नेपाल में दो भाषाओं की ही प्रधानता थी एक थी हिन्दी और दूसरी नेपाली धार्मिक और शैक्षिक कार्य हेतु अग्रेजी और संस्कृत का महत्व था हिन्दी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में शाहवंशीय राजाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता
        
नेपाल में खडीबोली हिन्दी-लेखन के आरम्भकर्त्ता के रूप में भवानी भिक्षु तथा केदारमान व्यथित का नाम आदर के साथ लिया जाता है इस परम्परा को आगे बढाने में अर्थात दूसरी पीढी के हिन्दी लेखकों में डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र, धुस्वाँ सायमिडॉ. गौरी शंकर सिंहडॉ. रामदयाल राकेश आदि कवि-लेखकों का नाम आता है शहीद शुक्रराज शास्त्री, वी.पी. कोईराला, बालचन्द्र शर्मा, पं.रमाकान्त झा, सुन्दर झा शास्त्री, काशी प्रसाद श्रीवास्तव, रामस्वरूप प्रसाद बी.., रामहरि जोशीडॉ. सूर्यनाथ गोपडॉ. शिवशंकर यादव आदि अनेक लेखकों की लेखनी ने नेपाल के हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है आज भी अनेक साहित्यकार और कवि हैं जो निष्काम भाव से हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

अगर ऐतिहासिक सन्दर्भ में देखा जाए तो हिन्दी की दृष्टि से राणा शासन काल तक कोई भाषिक समस्या नहीं थी हिन्दी शिक्षा का माध्याम थी और प्रशासनिक काम काज की भाषा भी वि।सं। २००७ के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र प्रगति हुई। लेकिन प्रजातंत्र के आगमन पर राष्ट्रभाषा-राजभाषा सम्बन्धी विवाद पैदा हुआ केवल नेपाली राजनीति बल्कि भाषा और शिक्षा सम्बन्धी नीतियों पर भी पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ उन्होंने यह व्याख्या की कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा है और संस्कृत मृतभाषा इस भाषा विवाद को समाप्त करने के लिए प्रजातांत्रिक नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद से लेकर पंचायती व्यवस्था के प्रथम प्रधानमंत्री तुलसी गिरि तक ने स्वीकार किया कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा नहीं है लेकिन इस विवाद में अन्ततः पराजय हिन्दी की हुर्इ हाम्रो भाषा, हाम्रो भेष की परिधि में राष्ट्रीयता की परिभाषा दिये जाने के कारण क्रमशः हिन्दी के प्रति नकारात्मक वातावरण तैयार होने लगा और लोग औपचारिक रूप में हिन्दी बोलने से भी डरने लगे
       
निरंकुशता की यह विशेषता होती है कि वह अपनी इच्छाओं को राष्ट्र पर लादती है और लोकतंत्र की यह विशेषता होती है कि वह जनाकांक्षा के आधार पर चलती है वि.सं. २०४६ के आन्दोलन के बाद देश में प्रजातंत्र तो आया मगर भाषा के सन्दर्भ में हमारा राजनैतिक चिंतन पंचायती मानसिकता से ग्रसित रही इसलिए इसकाल में भी हिन्दी विवाद का दूसरा नाम रहा विदेशी भाषा के रूप में इसे चिहृनित कर एक नकारात्मक वातावरण इसके प्रति पैदा किया गया यद्यपि हिन्दी के पक्ष में नेपाल के पर्व प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोईराला, कृष्ण प्रसाद भट्टरार्इ, मनमोहन अधिकारी और यहाँ तक कि महाराज वीरेन्द्र बिक्रम शाहदेव द्वारा भी समय-समय पर सकारात्मक टिप्पणियाँ की गई है लेकिन उसका खोया हुआ सम्मान नहीं लौटाया जा सका इसके बावजूद यह कहा ही जा सकता है कि नेपाल की प्रजातांत्रिक यात्रा में हिन्दी ने अपना योगदान दिया ही है इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि व्रि्रम संवत २०४६ का जनान्दोलन भारत के राजनैतिक और नैतिक समर्थन के आधार पर सफल हुआ था उस समय निरंकुश पंचायती व्यवस्था के विरोध में भारत के शीर्षस्थ नेताओं चन्द्रशेखर, सुब्रहृमण्यम स्वामी आदि नेताओं द्वारा दिए गए भाषण अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे और इनकी भाषा हिन्दी ही थी उस समय जो भी नेता नेपाली राजनीति के केन्द्र में थे और वे हिन्दी बोल सकते थे तो तराई में उनकी भाषा हिन्दी ही होती थी
          
अभी भी राजनैतिक स्तर पर विरोध चाहे जितना हो लेकिन तराई की लोकप्रिय भाषा के रूप में हिन्दी चिन्हित की जाती है और हमारे जो नेता हिन्दी बोल सकते हैं, अपनी राजनैतिक सभाओं में बेहिचक हिन्दी बोलते हैं, चाहे वह वि.सं. २०६३-६४ का जनान्दोलन- हो या उसके बाद का विभिन्न चरणों हुए तराई आन्दोलन तरार्इ आन्दोलन की तो एक तरह से भाषा ही हिन्दी बन गई थी यद्यपि इस आन्दोलन में विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को भी माध्यम बनाया गया लेकिन इसका प्रयोग क्षेत्रीय नेताओं द्वारा अधिक हुआ तरार्इ-मधेश के मुद्दे पर राजनीति कर रहे जो भी बडा नेता थे, जब भी वे भाषायी सीमा-क्षेत्र का अतीक्रमण करते तो अपनी राजनैतिक सभाओं में हिन्दी का ही प्रयोग करते शायद इसी उत्साह में हमारे उपराष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा ने अपनी पहली शपथ मधेशी वेश और मधेश की लोकप्रिय भाषा हिन्दी में ली यद्यपि इसके लिए उन्हें जो जलालत झेलनी पडी, उसे सब जानते हैं यह हिन्दी भाषा और उसकी लोकप्रियता का उद्घोष ही था कि २०६४ फागुन १६ गते की रात लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के साथ हुए आठ सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं नेपाली राजनीति के वयोवृद्ध नेता गिरिजा प्रसाद कोईराला ने हिन्दी में अपना वक्तव्य दिया था
             
वि.सं. २०६२-६३ के जनान्दोलन के बाद देश में नई व्यवस्था आई संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय प्रजातंत्र का मार्ग छोडकर देश गणतांत्रिक शासन पद्धति को अपनाया लेकिन राजनैतिक दलों के मूल्यों और मान्यताओं मैं कोई परिवर्त्तन नहीं आया यही कारण है कि गणतांत्रिक नेपाल में हिन्दी की यात्रा विवादों से ही प्रारम्भ हुर्इ और इसका तात्कालिक कारण उपराष्ट्रपति का शपथ-प्रकरण बना गौरतलब है कि विगत संविधानसभा के चुनाव में तराई-मधेश ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की और इसी के परिणामस्वरूप देश के दोनों संवैधानिक पदों पर मधेशी चेहरा आरूढ हुए इनमें से एक तो मधेशी संवेदना से इतने ऊपर उठ चुके हैं कि इसकी पहचान से जुडे मुद्दों की बात भी वे नहीं करते आज भी ऐसा मनोविज्ञान यहाँ है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने और हिन्दी भाषा का ज्ञान होने के बावजूद अपने इस भाषायी ज्ञान को सार्वजनिक रूप से नहीं स्वीकारते इससे उन्हें अपनी राष्ट्रीयता की भावना खण्डित होती नजर आती है यह बात तो हमें स्वीकार करना हशी चाहिए कि भाषा ज्ञान से राष्ट्रीयता का कोइ सम्बन्ध नहीं यह इतनी क्षुद्र वस्तु नहीं कि भाषा विशेष के ज्ञान से और इसकी सार्वजनिक स्वीकृति से लांछित हो जाए दूसरी ओर मधेश आधारित दल का प्रतिनिधि होने के कारण, वातावरण में आए खुलापन के कारण उत्साहित होकर उपराष्ट्रपति पद की शपथ परमानन्द झा ने हिन्दी में ली और इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बाबेला मचा पूरे नेपाल में विरोध प्रदर्शन हुए, पुतले जले देश का राजनैतिक वृत्त दो पाटों में बँटा हुआ नजर आया और अन्ततः यह मामला न्यायालय में परोस दिया गया इस मुद्दे पर श्रावण गते २०६६ में सर्वोच्च न्यायालय ने एक धमाकेदार फैसला दिया प्रधान न्यायाधीश मीन बहादुर रायमाँझी के इजलास ने उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में शपथ लेने को अवैध घोषित करते हुए पुनः  नेपाली में शपथ लेने का आदेश जारी कर दिया

सर्वोच्च के फैसले में कहा गया कि नेपाल में बोली जाने वाली सभी भाषा राष्ट्रभाषा है लेकिन सरकारी कामकाज की भाषा नेपाली है अतः उसी भाषा में शपथ लिया जाना चाहिए और एक तरह से उन्हें पुनः नेपाली में शपथ लेने की नसीहत दी गई प्रथमतः उपराष्ट्रपति ने न्यायालय के इस निर्णयको पूर्वाग्रहग्रसित कह कर मान्य होने की बात कही अब प्रारम्भ हुआ प्रतिक्रियाओं का दौर तत्कालीन सत्तारूढ एमाले के नेता केपी शर्मा ओली ने इसे संविधान सम्मत बतलाया जबकि एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने उन्हें न्यायालय का निर्णय मानने की सलाह दे डाली फोरम अध्यक्ष उपेन्द्र यादव का कहना था कि उपराष्ट्रपति को पुनः नेपाली में शपथ नहीं लेना चाहिए उनका यह भी कहना था कि संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट कहा गया है कि देश के सभी नागरिकों की जाति, धर्म, भाषा, वेशभूषा का सम्मान किया जाना चाहिए तो मधेश की संपर्क भाषा को लेकर इतना विवाद क्यों - तमलोपा अध्यक्ष महंथ ठाकुर ने भी सर्वोच्च के निर्णय को मधेश विरोधी बतलाया सदभावना पार्टी अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने भी लगभग इसी प्रकार की टिप्पणी की और प्रधानमंत्री को संविधान संशोधन की सलाह दी  मामला काफी उलझ चुका था और समाधान के लिए विधायिका द्वारा अन्तरिम संविधान संशोधन की आवश्यकता जतलायी जाने लगी थी   काफी राजनैतिक उतार चढावों के बाद संविधान का संशोधन हुआ और नेपाल में बोली जाने वाली समस्त मातृभाषाओं में शपथ की वैधता स्थापित की गयी और एक बार फिर हिन्दी को विवादों में घसीटने का प्रयास किया गया यद्यपि जनगणना के आँकडो में हिन्दी नेपाल में बोली जाने वाली मातृभाषाओं में सोलहवें स्थान पर सूचीकृत है लेकिन हिन्दी के विरोधी यह मानने के लिए तैयार नहीं कि हिन्दी किसी की मातृभाषा भी है वास्तव में मातृभाषा जैसा शब्द बदलते हुए सन्दर्भों में में संश्लिष्ठ अर्थ देता है मातृभाषा का यथार्थ तब घटित होता था जब पाँच-दस कोसों की दूरी में लागों के शादी-व्याह होते थे स्वभावतः उनकी सन्तान जो भाषा सीखती थी वह उनकी माँ की भाषा होती और वह उसकी मातृभाषा होती मगर आज परिस्थितियाँ बदली है और आवागमन की सुविधाओं के कारण या भौगोलिक दृष्टि से व्यापक क्षेत्र से संबंध होने के कारण शादी-व्याह में अब राष्ट्र की भी सीमाएँ खण्डित होती है, भाषायी क्षेत्र का अतिक्रमण तो होता ही है अब सवाल उठता है कि ऐसे दम्पति जो दो भाषिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनकी संतानों की भाषा क्या होगी - ऐसे लोग सामान्यतया ऐसी भाषा को परिवार में अपनाते हैं जिस तक दोनों की पहुँच हो इसलिए संतान इसी भाषा को अपनाते हैं और वही इनकी मातृभाषा होती है इसलिए भाषा के क्षेत्र में मातृभाषा जैसे शब्दों को छोड कर प्रथम और द्वितीय भाषा की अवधारणा को स्वीकार कर लिया गया है लेकिन हमारी राजनीति मातृभाषा का पल्लू पकड कर बैठी है और एक तरह से भाषा विवाद को उलझा कर रखी है
           
गणतंत्र नेपाल में हिन्दी के साथ एक विडम्बना यह भी घटित हुर्इ है कि जब कभी हिन्दी को अधिकार दिलाने या स्थापित करने की बात हुर्इ, उनका विरोध उन्हीं के द्वारा हुआ जिनकी यह भाषा  जानी या समझी जाती है यह सच है कि नेपाल की तरार्इ में विभिन्न भाषायी क्षेत्र हैं और समग्र रूप में ये हिन्दी भाषी क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं मगर आज वे ही हिन्दी की सत्ता स्वीकारने के लिए सहजता से तैयार नहीं है यद्यपि अवधी और भोजपुरी से इसे व्यापक विरोध नहीं झलना पडा लेकिन पूर्वी तरार्इ में हिन्दी को व्यापक विरोध झेलना पडा वास्तव में तरार्इ प्रदेश में हिन्दी के विरोध का वही मनोविज्ञान है जो नेपाल में हिन्दी के विरोध का मनोविज्ञान है दरअसल मुठ्ठी भर लोग जो क्षेत्रीय भाषाओं में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं और सरकारी अथवा गैर सरकारी स्तर पर बहुरंगी सुविधाओं का उपयोग कर रहे हैं, हिन्दी की लगाम छूटने पर उन्हें अपनी पहचान और अवसर पर प्रश्नचिन्ह लगता नजर आता है इसलिए अपने बेतरतीब बयानों से वे एक ओर तो वे लोगों को गुमराह करते हैं और दूसरी ओर हिन्दी के विरोध में लोगों में नकारात्मक संवेदना फैलाते हैं हमारी राजनीति इन प्रवृत्तियों को प्रश्रय देती है क्यों कि विभेद की इस जमीन पर उन्हें अपना लक्ष्य साधना आसान होता है इस तरह हिन्दी को हाशिये पर पहुँचाने का प्रयास होता है
         
नेपाल में हिन्दी के सम्मान के सन्दर्भ में यहाँ की राष्ट्रीय पार्टियाँ केवल उदासीन है वरन् तथ्यों की अपव्याख्या में भी संलग्न है तरार्इ की राजनीति करनेवाले राजनैतिक दल भी इस मुद्दे पर दिग्भ्रमित नजर आते हैं एक तथ्य से हमें नहीं मुकरना चाहिए कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिस प्रकार हिन्दी ने अपना योगदान दिया उसी तरह तराई आन्दोलन में हिन्दी पूरे तरार्इ की आवाज बनी यद्यपि डाँ. सूर्यनाथ गोप ने अपने एक शोध पत्र में यह तथ्य उदघाटित किया है कि हिन्दी के सम्बन्ध में नेपाल सदभावना पार्टी उतना स्पष्ट और मुखर कभी नहीं हो पायी जिना नेपाल तरार्इ  काँग्रेस थी ।७  अगर उनकी बातों की यथार्थता स्वीकार कर भी लिया जाए तो भी कहा जा सकता है कि तरार्इ काँग्रेस अब अस्तित्व में नहीं वर्त्तमान समय में हिन्दी के सन्दर्भ में सर्वाधिक स्पष्ट नेपाल सदभावना पार्टी ही है मगर इसमें इतने विभाजन हो चुके हैं कि इसकी शक्ति अपेक्षाकृत क्षीण हो चुकी है शेष दल हिन्दी के प्रति उदार तो हैं लेकिन भाषा के सन्दर्भ में क्षेत्रीय संवेदना को देखकर उनमें कहीं कहीं खौफ की स्थिति है और उन्हें अपना वोट बैंक प्रभावित होने का खतरा नजर आता है इसलिए हिन्दी का मुद्दा उनके लिए जटिल बन गया है यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दी के प्रति वे उदासीन हैं, वास्तव में जिस सक्रियता और स्पष्ट दृष्टिकोण की यहाँ आवश्यकता है, वह नहीं देखा जा रहा एक बात तो स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि मुद्दों पर अगर हम फिसलते हैं तो हमें भविष्य में अपने वजूद को भी स्पष्ट करने में कठिनाई महसूस होगी
            
वर्त्तमान समय में अगर देखें तो कहा जा सकता है कि हिन्दी केवल एक भाषा है वरन् एक ऐसी भाषाधारा है जो विभिन्न भाषाओं से आत्मीय सहयोग लेकर आगे बढती जा रही है संपुर्ण उत्तर भारत और नेपाल में बोली जाने वाली भाषाओं से इसका कोई विरोध नहीं आज ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी के साहित्य को हिन्दी से निकाल दिया जाए तो उसका मध्यकाल कान्तिविहीन हो जाएगा आज हिन्दी अपने व्यापक आलिंगन में उर्दू को भी समेट रही है कैफी आजमी, निदा फाजिली जैसे कवि-शायर हिन्दी के पाठ्यक्रमों में समाहित किए गए हैं और समाहार की इसी विशेषता के कारण आज वह दक्षिण एशिया की संपर्क भाषा के रूप में तो आकार ग्रहण कर रही है और विश्वभाषा बनने के कगार पर है एक बडा पाठक वर्ग हिन्दी की ताकत है इसलिए नेपाल में हमारे द्वारा यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि नेपाली के महान साहित्यकारों को भी हिन्दी साहित्य में समावेशित किया जाना चाहिए-या तो मौलिक रूप में या अनुवादित रूप में
           
गणतंत्र नेपाल में हर वर्ग अपनी मुक्ति चाहता है और अपने अधिकारों की सुरक्षा चाहता है इसी तरह नेपाल में बोली जाने वाली हर भाषा भी किसी किसी रूप में अपनी मुक्ति चाहती है जो किसी भाषा विशेष के दबाब के कारण सम्यक् रूप से पल्लवित और पुष्पित नहीं हो पायी नेपाल में हिन्दी का संघर्ष आज उन सभी भाषाओं की मुक्ति का संघर्ष है एक बात तय है कि जिस दिन इस देश में हिन्दी के लिए बन्धन और वर्जनाओं की बाँध टूटेगी उस दिन से नेपाल में भाषा विवाद ही समाप्त हो जाएगा और हर भाषा को सम्मान करने का गुण विकसित होगा नेपाल में हिन्दी बहुप्युक्त है, इस बात से किसी को विमति नहीं हो सकती, इसके प्रयोग को प्रोत्साहित करने वाले कारकों और तत्वों को भी हम जानते हैं लेकिन ऐसा वातावरण तो तैयार होना ही चाहिए कि यह प्रयोग स्वस्थ और सुन्दर हो इसके लिए पूर्वाग्रह मुक्त मन से सोचना ओर करना होगा।